विगत दो दिन से जो कुछ घटा उसमे या तो मैं आपको ठीक से समझा नहीं पाया या शायद आप समझ नहीं पाए. या गलती शायद माध्यम की थी. क्यूंकि मैंने माध्यम ट्विटर को चुना जो एक साथ ज्यादा बात लिखने नहीं देता. इसलिए इस ब्लॉग के माध्यम से कोसिस करके देख रहा हूँ. ज्यादा लिख नहीं पाता, आज लिखूंगा तो गलतियाँ भी होंगी. नजरंदाज कीजियेगा.
पिछले तीन चार साल से देश रोज भार्स्ताचार के नए किस्से सुन रहा था. अन्ना आन्दोलन के रूप में एक झोंका आया जो बदलाव की उम्मीद लाया. जल्दी समझ आने लगा की आन्दोलन बड़ा मकसद हल नहीं कर सकता, तो आन्दोलनकारी राजनीती की तरफ मुड़े. सिर्फ मुड़े नहीं बल्कि हवाओं का रुख भी तेजी से मुड़ने लगा. वर्षों की चुप्पी आवाज़ में बदली. आवाज़ का वाहन बनी एक नयी पार्टी.
नयी पार्टी अगर पुराने ढर्रे पे चलती तो शायद(यक़ीनन) पैर नहीं जमा पाती. पार्टी को बाकी पार्टियों से अलग दिखना जरुरी था. पार्टी ने ताबड़तोड़ तरीके से काम शुरू किया. प्रतिदिन जो हो रहा था वो अपर्त्याशित था. लोगों में विश्वास भी जागने लगा था की बदलाव अब सिर्फ सपना नहीं रहेगा. इस नयी पार्टी में बहुत कुछ ऐसा था जो उम्मीदें जगाता था. सबसे मुख्य बिंदु ये थे
1. पार्टी मजबूत जनलोकपाल (अन्ना-अरविन्द वाला) के लिए प्रतिबद्ध दिखी
2. पार्टी स्वराज लाने को आतुर दिखी
3. पार्टी धर्म और जाती की राजनीती से उपर दिखी
4. पार्टी चुनाव साफ़ धन से लड़ने का वादा कर रही थी
समय आगे बढ़ा, कई घटनाएँ घटी, छोटी भी और मोटी भी, जिनको नजरंदाज भी कर सकते हैं या फिर नहीं भी कर सकते, ये आपके नजरिये पर है. उपरोक्त में से सबपे पार्टी आज कहाँ कड़ी है इस्पे एक एक करके चर्चा करना चाहूँगा
मजबूत जनलोकपाल (अन्ना-अरविन्द वाला)
कांग्रेस और अन्य पार्टियाँ संसद में लोकपाल का कैसे मजाक उडा रही थी ये सबको पता है. लगभग उसी दोरान उत्तर भारत के खूबसूरत पहाड़ी राज्य उत्तराखंड के तात्कालिक मुख्यमंत्री भुवन चंद खंडूरी ने इसको गंभीरता से लिया. उनकी छवि एक इमानदार और कड़क CM ली पहले से थी. उन्होंने अन्ना और अरविन्द से संपर्क किया, सलाह ली और उनकी रजामंदी से एक मजबूत लोकायुक्त बिल पास किया. कुछ समय बाद वो सत्ता से बहार हो गए.
समय बदला और आन्दोलनकारियों की पार्टी मैदान में आ गयी. जन्लोक्पल का दावा किया पर चुनाव में खंडूरी के खिलाफ ही उम्मीदवार उतार दिया. अगर यह पार्टी सच में मजबूत जनलोकपाल (अन्ना-अरविन्द वाला) के लिए गंभीर है तो कम से कम खंडूरी की इज्जत की जानी चाहिए थी.
मैंने विरोध जताया तो साथियों ने कहा की क्यूंकि वो बीजेपी में हैं इसलिए उनके खिलाफ उम्मीदवार उतारा गया. अगर वो "आप" में आयें तो उनका स्वागत किया जायेगा.
पहली बात, जब वो जनलोकआयुक्त पास कर रहे थे तब भी वो बीजेपी में थे. मतलब की वो बीजेपी में रहते भी अच्छे काम कर सकते हैं.
दूसरी बात, आज भी अरविन्द या कोई और साथी उनकी कोई कमी नहीं निकल पाया. मतलब की उनका विरोध सिर्फ इसलिए हो रहा है की उन्होंने "आप" हाई कमांड की जगह "बीजेपी" हाई कमांड की गुलामी मजूर कर रखी है. मैंने गुलामी शब्द क्यूँ इस्तेमाल किया इसकी चर्चा आगे करूँगा.
तीसरी बात, आप को चाहिये था की आप खंडूरी की मजबूत करके दूसरी पार्टी में अच्छे आदमी को जितने में मदद करते. आखिर आप राजनीती करने नहीं बल्कि बदलने आये थे.
इस सारे घटनाकर्म से मुझे व्यक्तिगत तोर पर लगता है की जनलोकपल पिछले तीन साल से मार्केटिंग टूल बना हुवा है, इसके लिए कोई गंभीर नहीं है.
स्वराज
अर्थ आप जानते हैं. फिर भी दोहराता हूँ. अपना राज. लोगों का राज. फैसलों में व्यापक भागीदारी. विकेन्द्रीयकरण.
आसान भाषा में, मेरे गाँव से जुड़े फैसले मेरे गाँव के लोग लें, मेरे जिले ले फैसले मेरे जिले के लोग लें. ये फैसले कम से कम दिल्ली से ना थोपे जाएँ.
अगर पार्टी स्वराज लाना चाहती तो इसे सबसे पहले पार्टी में लागू किया जाना चाहिये था. तो कुछ प्रयोग करने तय किये गए. उदाहरन के तोर पे उम्मीदवार जनता से पुछकर तय करना. दिल्ली चुनाव से पहले आंतरिक चुनाव करवाए गए जिसकी गिनती का किसी को पता नहीं चला. उम्मीदवार PAC नामक हाई कमांड ने तय किये.
दिल्ली चुनाव बीते. सफलता ने नेताओं ले दिलोदिमाग पे अपना असर दिखाना शुरू किया. अब उम्मीदवार सीधे उपर से भेजे जाने लगे. (एक इंटरव्यू वाली प्रक्रिया भी थी जिकसी चर्चा थोड़ी देर में करता हूँ)
कई जगह छोटी या मोटी बगावत हुयी.
उदाहरन के तोर पे हिसार. 90% से ज्यादा लोग वहां से घोषित प्रत्याशी से सहमत नहीं थे. स्वराज के अनुसार ये फेसला हिसार के लोगों पे छोड़ दिया जाना चाहिए था या उनके ऐतराज के बाद बिना देरी किये प्रत्याशी बदल दिया जाना चाहिए था. पर हाई कमांड ने इसे नाक का सवाल बना लिया. इस बीच उस स्वराज के नारे का मजाक बनता रहा.
एक और उदाहरण के तोर पे चंडीगढ़. यहाँ पार्टी पे दो अच्छे उम्म्द्वर सविता भटठी और गुल पनाग के रूप ,इ दिए लेकिन तरीका फिर वही था, सीधे हाई कमांड द्वारा थोप दिए गये. स्वराज के अनुसार कम से कम चंडीगढ़ वालो को पहले विश्वास में तो लिया ही जाना चाहिए था.
उम्मीदवार चयन से हटकर भी देखें तो भी पार्टी में कहीं भी किसी भी स्तर पे स्वराज नाम की चिड़िया ढूंढे नहीं मिलती.
अरविन्द ने एक किताब भी लिखी. 2010 के दोरान उसी को पढके मैंने अरविन्द का साथ देने का निर्णय किया था. अब मुझे वक्तिगत तोर पे लगता है की अरविन्द स्वराज में कोई विश्वास नहीं रखते. किताब भी शायद कहीं से कॉपी पेस्ट थी.
धर्म और जाती की राजनीती
कांग्रेस बीजेपी सपा बसपा टाइप सभी दल यह राजनीती करते थे/हैं/रहेंगे
पर नया दल तो नए तरीके की बात करता था. पर जल्दी ही नयी हाई कमांड ने भी इस जरुरत को समझ लिया. कांग्रेस ख़तम हो रही थी और मोदी उभर रहे थे. जल्दी इस बात का आभाष हो गया था की अगली जंग में हमें किसका सामना करना है. मोदी कट्टर हिंदूवादी चेहरा थे. तो दूरगामी योजना बनी दुसरे सबसे बड़े धरम मुश्लिमों को साथ लेने की. दूरगामी और सही फैसला था. पर जल्दबाजी में नेता जी खुद को कोर्ट से उपर मानते हुवे बतला हाउस और कुछ अन्य एनकाउंटर पे ज्यादा बोल गए. लेकिन ये सब पक्ष में जा रहा था. छोटी गलतियाँ थी तो कोई ध्यान भी नहीं दे रहा था.
बीते दिनों राजनीती में माहिर कहे जाने वाले योगेंदर यादव जी का नया रूप सामने आया. इस नए रूप के लिए उन्होंने मेवात को चुना. मेवात में दो खासियत हैं. एक तो वो मुश्लिम बहुल है और दूसरा यादव की के निर्वाचन छेत्र का हिस्सा है.
यादव जी ने मुश्लिमों के बीच कहा : "मेरा बचपन का नाम सलीम है, पापा भी इसी नाम से बुलाते थे, योगेंदर नाम थोडा लम्बा हो जाता है, आप मुझे सलीम बुलाया कीजिये, ये नाम मेरे दिल के करीब है"
कार्यकर्ताओं को भी हिदायत दी गयी की मेवात इलाके में उनका नाम सलीम लिया जाए.
बात बाहर पहुंची, विवाद शुरू होने से पहले ही चतुर योगेंदर जी बचाव तैयार कर लाये की सलीम उनका बचपन का नाम था जो की सच भी है. किसी का अलग या निक नाम हो सकता है, वो किसी मुस्लिम नाम से मिलता भी हो सकता है. इसमें कोई बुराई नहीं. हो सकता है सलीम नाम उनके दिल के करीब हो, इसमें भी कोई बुराई नहीं.
बुराई उस नाम के सियासी इस्टेमाल में है. अगर आपको अपना सलीम नाम पसंद है तो आप दिल्ली, जंतर मंतर, या मिडिया में या टीवी पे किसी दिन बताते की आपको योगेन्द्र नाम लम्बा लगता है तो आपको सलीम बुलाया जाए. पर आपने वोटों की खातिर इसको बड़ी चतुराई से वहां इस्तेमाल किया जहाँ फायदा दिखा.
पार्टी हिन्दू मुश्लिम को बराबर समझे ये काबिलेतारीफ है, पर वोटों के लिए इस तरह के हथकंडे शर्मनाक है.
चुनाव साफ़ धन से लड़ने का वादा
यह पार्टी का ट्रम्प कार्ड साबित हुवा. शायद दुनिया में अपनी तरह का पहला प्रयोग.
पार्टी अपने चंदे और खर्चे का हिसाब पारदर्शी ढंग से रखती है.
बीच में पता चला कि नकद में काम भी चल रहा है जिसका कोई हिसाब नहीं और वो भी करोड़ों में. लेकिन उसपे जयादा यकीं नहीं था. कुछ मात्रा में हो भी सकता है. लेकिन पार्टी का प्रयास इस मामले में पूरी पारदर्शीता का है जो सराहनीय है.
दिल्ली चुनाव के बाद दोबारा से पार्टी अब तक करीब 22 करोड़ जुटा चुकी है.
पर चोंकाने वाली बात यह है की यह धन किसी भी उम्मीदवार को आवंटित नहीं होगा. पार्टी उम्मीदवारों को अपने खर्च पे चुनाव लड़ने या अपने स्तर पे धन जुटाने का आदेश दे चुकी है. यानी जो तरीका उम्मीदवार अपने चुनाव खर्च के लिए अन्य पार्टियों में इस्तेमाल करते हैं , लगभग वही तरीका "आप" वालों को भी इस्तेमाल करना होगा. कुछ बड़े चंदे का अहसान उम्मीदवारों को लेना होगा जो बाद में चुकाना भी होगा.
एक और चोंकाने वाली बात यह है की पार्टी जब टिकेट के इच्छुक उम्मीदवारों के इंटरव्यू ले रही थी तो सबसे पहला सवाल धन सम्बंधित था. पहला सवाल था की आप पैसा कितना खर्च करेंगे. कुछ अपवादों को छोडकर खर्च कर पाने की क्षमता को वरीयता मिली.
"अच्छे" और जितने/पैसा लगाने में "सक्षम" में फरक होता है. हो सकता है अच्छा सक्षम भी हो और हो सकता है अच्छा हो लेकिन सक्षम ना हो. पर वरीयता उसको मिली जो सक्षम था. (कुछ अपवाद भी हैं)
उपर की चर्चा इस बात पे थी की क्यूँ मुझे लगता है की ये वो पार्टी नहीं है जो शुरू में बनायीं गयी थी. बहुत थोड़े से कारण मैंने बताये, असल में और बहुत कुछ है जो अभी इसलिए खुले में नहीं लिखना चाहता की थोड़ी सी ही सही उम्मीद अब भी बाकी है.
आम चुनाव
अब आम चुनाव सर पे खड़े हैं. आप "आप" की कमी निकल के पुराने टाइप की तरफ देखेंगे या अभी भी "आप" को मोका देंगे. ये सवाल आते ही असली कोफ्त होती है. कांग्रेस बीजेपी टाइप का ख्याल आते ही लगता है कि "आप" अभी भी उतनी बुरी नहीं है
लेकिन गोर से सोचें तो सवा सो साल पहले कांग्रेस देशभक्तों ने ही बनायीं थी. कुछ दसक पहले बीजेपी को भी देशभक्तों में बनाया. सपा, राजद, जेडीयू ये सब भी आंदोलनों से ही निकली.
असल में कोई पार्टी बुरी नहीं होती. पार्टी बुरी तब बन जाती हैं जब मूल भावना खोने लगती है और बुराइयां घुसने लगती हैं. कांग्रेस को आज की डरावनी कांग्रेस बन्ने में शताब्दी से ज्यादा समय लगा. बीजेपी को कुछ दशक का. सपा राजद जेडीयू को भी. लेकिन "आप" तो लगता है की दो तीन साल में ही बाकियों से बुरी बन्ने की होड़ में है.
अब लगभग ये तय हो चूका है की देश को अगले कुछ साल मोदी जी का दंस झेलना पड़ेगा. और मुझे इसके लिए "आप" हाई कमांड का घमंड और गलत नीतिया जिम्मेदार दिखती हैं. "आप" कुछ महीने पहले तक मोदी को रोक पाने की सतिथि में थी. अपनी सरकार भले न बनती पर मोदी का रथ रुक सकता था. लेकिन एक के बाद एक चमचो को टिकेट मिले, कई बड़े नेता संगठन मजबूत करने की जगह संगठन में अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटे रहे. पुराने आन्दोलनकारी साथी दूर हट गए. रही सही कसर बिकाऊ मीडिया ने दिन रात "आप" के खिलाफ बेसिरपैर की कहानियां सूना के पूरी कर दी.
आप सहमत हो या नहीं पर मुझे पार्टी मात्र 18 सीटों पे ही लडाई में दिखती है, जीतेगी कितनी पता नहीं.
हाँ पार्टी कुछ ऐसे चेहरों को संसद में भेजने में जरुर कामयाब हो जाएगी जो इस पार्टी के आने से पहले हम नहीं सोच सकते है. साथ ही अच्छे वोट शेयर से रास्ट्रीय पार्टी का दर्जा भी पा जाएगी.
थोड़ी देर पहले किसी साथी ने पूछा की "आप" की हार से फायदा किसका है. मेरा जवाब था "आप" का.
मान लो अगर "आप" 100 सीटें जीत गयी तो आप के नेता कहेंगे की उनके तरीके नीतियाँ और रणनीतियां सब सही थे. क्यूंकि फिलहाल उनके लिए जीत के नतीजे सिद्धांतों से कहीं ज्यादा मायने रखता हैं.
पर यही पार्टी 10-15 पे रह जाती है, तो जीत को महतवपूर्ण सम्झने वाली टोली कमजोर पड जाएगी. तब अरविन्द गहरे मंथन को मजबूर होंगे. उसी सूरत में पार्टी सिद्धांतों की और वापस लोट सकती है.
आज बहुत लिख चूका. शायद ज्यादातर पाठक इतना नीचे तक पहुंचे भी नहीं हो और उबकर बीच में छोड गए हो.
चलते चलते ख्यालिया का जिक्र जरुर करूँगा. पर्याप्त तथ्य इस बात के हैं की वो सही आदमी नहीं है और इस बात के भी कि किस तरह योगेन्द्र यादव ने तानाशाही से उसको उम्मीदवार बनवाया. पर मुझे ज्यादा दुःख इस बात को जान के लगा की निजी बातचीत में अरविन्द ने भी मान लिया कि यह सही आदमी नहीं है. अरविन्द ने कुछ कार्यकर्ताओं से निजी बातचीत में कहा "हिसार मेरा घर है, मैंने अपने कई रिश्तेदारों से पुछा तो सबका कहना था की ख्यालिया बेईमान आदमी है. पर फिर भी मेरी मज़बूरी है"
क्यूंकि ये निजी बातचीत थी इसलिए मैं साबित नहीं कर सकता. लेकिन अरविन्द इसको मेरी आँखों में आँख डालकर ख़ारिज भी नहीं कर सकते. मुझे उनकी मज़बूरी समझ नहीं आती की योगेन्द्र से इतना डर क्यूँ है.
अब साथी आकर कई तरह से समझाते हैं. मैं इतना ही कहता हूँ "हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन, दिल को बहलाने का ख्याल ये ग़ालिब अच्छा है"
निजी तोर पे अरविन्द अब मेरे दिल से पहले वाली जगह खो चुके हैं, लेकिन बड़ा सवाल देश का है.
अगली लोकसभा भी देश को शर्मशार ही करेगी इसमें शक नहीं. लेकिन कुछ अच्छे लोग हम संसद में भेज सकते हैं इसका मोका इस नयी पार्टी ने जरुर दे दिया है, उनका साथ दें. लेकिन ज्यादा उम्मीदें भी ना पालें
जय हिन्द